Bhartiya Sena Essay

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Here is an essay on the Indian Army especially written for school and college students in Hindi language.

भारतीय सैन्य व्यवस्था विश्व की श्रेष्ठतम व्यवस्थाओं में से एक है जिसमें सीमित संसाधनों के द्वारा भी विजय प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है ऐसे अनेकों अवसर आये जब भारतीय सैनिकों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपनी देशभक्ति का अदभुत परिचय दिया ।

धन्य है इस देश की वे माताएं जिन्होनें ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया । जिन्होने युवास्था में ही अपनी जिन्दगी देश के लिए न्यौछावर कर अपनी देश भक्ति की मिशाल पेश की । भारत चीन युद्ध हो या फिर भारत पाक युद्ध, कारगिल युद्ध हो या सीमा पार से छदम युद्ध ।

सभी में भारतीय सैनिकों ने बहादुरी की मिशाल पेश की । वो भी सीमित संसाधनों के द्वारा । जिससे भारतीय सेना को विश्व की श्रेष्ठतम सेना का दर्जा प्राप्त होता है । संसाधनों की यदि बात की जाये और यूरोप के देशों की सेना तो दूर पुलिस से भी भारतीय सेना के संसाधनों की तुलना की जाए तो हमारी जांबाज सेना के पास अत्याधुनिक संसाधनों का अभाव है ।

लेकिन संसाधनों के अभाव के बाद भी भारतीय सेना विश्व की किसी भी सेना से मुकाबला करने में श्रेष्ठ है जो केवल भारतीय सेना के अदभुत साहस के बल पर ही सम्भव है । यह सब सम्भव है उनके धैर्य पर भी जो अपने घर-परिवार से दूर देश की सीमा पर दिन-रात एक कर डटे हुए हैं और उफ तक नहीं करते ।

यह भारतीय सेना के अनुशासन की मिशाल है । इस देश के नीतिकारों को इस गम्भीर विषय पर विचार कर भारतीय सैनिकों की पीड़ा को समझना चाहिए कि घर-परिवार से दूर रहना कितना पीड़ादायक होता है । इस गम्भीर समस्या के समाधान हेतु कोई ठोस कदम उठाना चाहिए ताकि भारतीय सैनिकों को घर-परिवार से दूर रहने की पीड़ा न झेलनी पड़े । भारतीय सैनिक ही देश के सच्चे सेवक व देशभक्त हैं जो सैकड़ो कष्ट उठाकर इस देश को सुरक्षित रखते हैं ।

वे सुरक्षित रखते हैं इस देश के नीतिकारों को, वे सुरक्षित रखते हैं देश के मान-सम्मान को, वे सुरक्षित रखते हैं इस देश की मर्यादा को, वे सुरक्षित रखते हैं इस देश के नागरिकों को, वे सुरक्षित रखते हैं इस देश की युवा शक्ति को, वे सुरक्षित रखते हैं इस देश के बुद्धिजीवियों को, लेकिन उक्त सब लोग इसके बदले मे इस देश के सैनिकों को क्या देते हैं ।

कभी किसी ने विचार किया ही नही, ये सब लोग देश के सैनिक परिवारों तक को सुरक्षित नहीं रख पाते । एक तो वो सैनिक जो इस समस्त देश को सुरक्षित रखते हैं और दूसरी ओर वो समस्त नागरिक जो इस देश की सीमा के अन्दर रहते हुए उन सैनिक परिवारों को भी सुरक्षित नहीं रखपाते जिनके जाबाज बहादुर सम्पूर्ण देश को सुरक्षित रखते हैं । यह व्यवस्था की कमी कही जा सकती है या फिर नागरिकों की इच्छा शक्ति की ।

यहां भारतीय व्यवस्था तो दोषी है ही जो आजादी के तिरेसठ वर्ष बाद भी भारतीय सैनिकों के लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध करने में असमर्थ रही है । जो असमर्थ रही है उनको ऐसी व्यवस्था करने में कि भारतीय सैनिकों को देश की सीमा, सीमा नहीं अपना घर परिवार दिखायी दे ।

प्रत्येक सैनिक को सीमा पर भी परिवार रखने की व्यवस्था हो जब भारतीय सैन्य अफसर प्रत्येक जगह अपने परिवार के साथ रह सकते हैं । तो भारतीय सैनिक क्यों नही ? आधुनिकता के इस युग में जब तकनीकी अपने उच्चतम शिखर पर है तब भी भारतीय सैनिक उच्च तकनीकी को मोहताज हैं और केवल अपने धैर्य और साहस के दम पर ही अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं ।

अन्यथा भारतीय सेना की तस्वीर ही कुछ और होती, जिसके लिए दोषी है भारतीय व्यवस्था जो अपने रक्षकों को पर्याप्त तकनीकी सुविधाओं तक मुहैया नहीं करा पा रही है । इसके अलावा जो सुविधाएं भारतीय सैनिकों के परिवारों को मिलनी चाहिए जिससे उन सैनिक परिवारों को अपने आप को नागरिक परिवारों से अलग होने का एहसास हो सके ।

वे मूलभूत सुविधाएं भी सैनिक परिवारों को नसीब नहीं हो पा रही है जिसका परिणाम यह है कि वर्तमान समय में कुछ अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो कोई भी युवा सेना में भर्ती होने में रूचि नहीं ले रहा है यही कारण है कि वर्तमान समय में सेना में हजारों अफसरों व लाखों सैनिकों की कमी चल रही है ।

जिसके पीछे निजी क्षेत्र की चकाचौंध भरी जिन्दगी, अच्छा वेतन पैकेज भी युवाओं को सेना में भर्ती होने से रोक रहा है । आधुनिकता की इस दौड़ में युवा देश प्रेम का पाठ भूलकर धन प्रेम का पाठ पढ़ रहे हैं । तभी तो युवाओं का झुकाव सेना में भर्ती होने में नहीं है ।

अगर यही स्थिति रही तो सेना में अफसरों व सैनिकों की भारी कमी होगी । जिसके लिए कुछ हद तक दोषी है भारतीय व्यवस्था जो सेना के प्रति युवाओं को आकर्षित करने में असफल रही है योग्य और प्रतिभाशाली युवाओं का झुकाव सेना के प्रति न होकर निजी क्षेत्र की चकाचौंध की ओर है एक तो आकर्षक वेतन पैकेज दूसरा भौतिक सुख सुविधाएं जो भारतीय युवाओं को सेना में जाने से रोक रही हैं ।

यदि भारतीय नीतिकार इस गम्भीर विषय पर चिंतन करें तो निश्चित ही उनको समस्या का समाधान मिल जायेगा । जब भारतीय युवाओं को सेना व निजी क्षेत्र की सुख सुविधाओं में कोई अन्तर दिखाई नही देगा और वे सेना के महत्व को समझेंगे ।

साथ ही भारतीय सैनिकों को समाज व देश में विशिष्ट दर्जा प्राप्त होगा तो निश्चित ही भारतीय युवाओं के दृष्टिकोण में बदलाव आयेगा और भारतीय युवाओं का भारतीय सेना में भर्ती के विषय में दृष्टिकोण में बदलाव ही भारतीय सेना के महत्व को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा ।

भारतीय सेना विश्व की श्रेष्ठतम सेनाओं में से एक है और इस श्रेष्ठता को हमें बताने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि जब-जब भारतीय सेना को अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का अवसर मिला है उसने संसाधनों की कमी या आधुनिक हथियारों की कमी या वेतन की कमी का रोना रोये बिना अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की, जो इस बात को प्रमाणित करती है कि भारतीय सेना विपरीत परिस्थतियों में भी जंग जीतने में सक्षम है ऐसे अनेकों अवसर आये है ।

जब भारतीय सेना ने अपने साहस और बहादुरी का परिचय देते हुए दुश्मन को धूल चटा दी चाहे कारगिल की पहाड़ियों पर अपनी मजबूत पकड़ बना चुके दुश्मन हों या फिर हमारे पवित्र धार्मिक स्थल पर कब्जा जमाये आतंकी हो, जिनको नेस्तानाबूत करने में भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस और बहादुरी का परिचय देकर सम्पूर्ण भारतवर्ष का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया ।

भारतीय सैनिकों में जो देशभक्ति का जज़्बा देखने को मिलता है जो अनुशासन देखने को मिलता है वह शायद ही दुनिया के किसी देश की सेना में हो । भारतीय सैनिक जब सेना की वर्दी धारण करता है तो उसके अन्दर एक अलग तरह की भावना जागृत होती है जो कहती है कि जब तक यह वर्दी उसके शरीर पर रहेगी वह अपने देश के दुश्मनों को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा ।

इसके लिए चाहे उसे अपने प्राणों की बाजी भी लगानी पड़ेगी तो भी वह निसंकोच होकर अपने प्राणों की बाजी लगाने से पीछे नहीं हटेगा । यही प्राण-न्यौछावर करने का अपने देश के लिए भारतीय सैनिकों का जज़्बा है । भारतीय सेना की ताकत का हिस्सा है तभी तो हम निसंदेह होकर कहते हैं कि भारतीय सेना विश्व की श्रेष्ठतम सेनाओं में से एक है ।

भारतीय सैनिक बामुश्किल वर्ष में एक या दो महीने ही अपने परिवार के साथ बिताते हैं और बाकी के दस-ग्यारह महीने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए व्यतीत करते हैं । शायद ही दुनिया की ऐसी कोई सेना हो जो इतना समय अपने परिवार से अलग व्यतीत कर सके ।

यदि भारतीय सैनिकों की अनुशासन की बात करें तो इसका कोई अपवाद भी आपको नहीं मिलेगा जब किसी भारतीय सैनिक ने अनुशासन हीनता की हो, यही सब गुण तो भारतीय सेना की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं तभी तो भारतवर्ष में रिटायर्ड सैनिकों की निजी श्रेत्र व दूसरे सरकारी विभागों में अत्यधिक माग है जो भारतीय सैनिकों की श्रेष्ठता के कारण ही है अन्यथा रिटायर्ड व्यक्ति को कोई भला क्यों पूछेगा ?

भारतीय सैनिक सम्पूर्ण भारतीय नागरिकों के लिए धैर्य साहस, बाहदुरी ओर ईमानदारी व अनुशासन प्रियता के लिए आदर्श माने जाते हैं । कोई भी व्यक्ति भारतीय सैनिकों की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता है । भारतीय सैन्य अफसरों के विषय में कुछ अपवादों को यदि छोड़ दिया जाये ।

जिनसे भारतीय सेना का मनोबल गिरता है जो कुछ अपवाद स्वरूप हैं जिनमें भारतीय सैन्य अफसरों ने अपनी मर्यादा लांघकर आदर्शों का उल्लंघन कर लालच के वशीभूत होकर भारतीय सेना को कलंकित किया । चाहे वो सुकना जमीना घेटाला हो या मुम्बई का आदर्श सेसाइटी घोटाला, जिसमें भारतीय सैन्य अधिकारियों के नाम आने से भारतीय सेना पर कलंक के दाग लगे हैं जो शायद ही जांच रिपोर्टो के सही आने पर भी धुल सके ।

क्योंकि भारतीय सेना वर्तमान समय तक बेदाग रही है लेकिन कुछ अवसर ऐसे आये जब भारतीय सैनिकों ने तो सेना वदेश का सिर गर्व से ऊंचा किया लेकिन भारतीय सैन्य अधिकारियों ने लालच के वशीभूत होकर भारतीय सेना ही नहीं इस देश को ही शर्मसार कर दिया । अन्यथा भारतीय सेना की छवि बेदाग रही है ।

जो दुनिया के दूसरे देशों के लिए एक उदाहरण रहा है कि भारतीय जो विभिन्न भावानाओं और विभिन्न संस्कृतियों का देश होते हुए जहां क्षेत्रियता का भी प्रभाव वहां की राजनीति में देखा जाता है उसके बाद भी आज तक भारतवर्ष एक अटूट देश के रूप में दुनिया के सामने है जबकि उसके पड़ोसी देशों में वहां की राजनीति में सेना का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है ।

जब समय-समय पर वहां के सेनाध्यक्षों ने लोकतांत्रिक सरकारों को उखाड़ कर सैन्य शासन स्थापित किया है लेकिन भारतवर्ष एकमात्र ऐसा दुनिया का देश है जहा सबसे अनुशासित सेना मौजूद है । जिसका भारतीय राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है अन्यथा पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार ऐसे देश है जहां सैन्य अफसर वहां की राजनीति को प्रभावित करते हैं और स्वयं देश की सत्ता पर काबिज होने की रणनीति बनाते रहते है । ऐसा नहीं है कि भारत में सैन्य अफसरों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है ।

भारतीय सैन्य अफसरों में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है लेकिन भारतीय राजनीतिक परिस्थतियां उन सैन्य अफसरों के अनुकूल नहीं हैं जो सेना मे सेवा के दौरान राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखते हैं । हां ऐसा अवश्य है कि भारतीय सैन्य अफसर सेना से सेवामुक्त होने के उपरान्त अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करते हैं यही व्यवस्था भारतीय सेना को अनुशासित करने के लिए पर्याप्त है ।

तभी तो भारतीय सेना ने आज आजादी के तिरेसठ वर्ष बाद तक अपनी मांगों के लिए कोई उफ तक नहीं की । कितना वेतन उनकों मिलता है, कितनी सुविधाएं उनको मिलती हैं, किसी ने कोई जिक्र तक नहीं किया । क्योंकि भारतीय सैनिक सेना की वर्दी पहनते ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो जाता है और उसके अन्दर यह भावना नहीं होती है कि उसको कितना पैसा मिलता है कितनी सुविधाएं मिलती हैं ।

वह तो केवल अपने देश के प्रति अपनी वफादरी का परिचय देते हुए एक अनुशासित सैनिक के रूप में कार्य करता है और जिसका लाभ उठाते हैं । भारतीय व्यवस्था के नीतिकार जो भारतीय सेना के अनुशासित होने का भरपूर लाभ उठाते हैं तभी तो भारतीय सैनिकों के आजादी के तिरेसठ वर्ष बाद भी ऐसी सुविधाएं मिल रही है जो आज से तिरेसठ वर्ष पहले मिलनी चाहिए थी । जिसके लिए दोषी है भारतीय व्यवस्था के नीतिकार जो केवल उन्हीं की ओर देखते हैं जिससे उन्हें या तो कुछ लेना होता है या फिर वो अपना अधिकार मांगते हैं जिससे मजबूरीवश उनको देना पडता है ।

क्योंकि भारतीय नीतिकार जानते हैं कि भारतीय सेना एक अनुशासित सेना है ओर आप उसको कुछ दे या न दे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि विरोध प्रकट करना भारतीय सेना के लिए अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है और इसी आदर्शता का लाभ भारतीय व्यवस्था के नीतिकार उठाते हैं तभी तो आज तिरेसठ वर्ष बाद भी भारतीय सैनिक उस तकनीकी सुख सुविधाओं व अन्य भौतिक सुख सुविधाओं से महरूम हैं जो आज से काफी समय पहले भारतीय सैनिकों को मिल जानी चाहिए थी ।

लेकिन दुर्भाग्य इस देश का और दोष भारतीय व्यवस्था के नीतिकारों का कि आज तक आधुनिक तकनीकी सुख सुविधाओं के अभाव में भी भारतीय सेना अपनी श्रेष्ठता सिद्ध किये हुए है जो इंगित करती है कि भारतीय सैनिक अब अभाव में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने में सक्षम है तभी तो अनेकों अवसरों पर भारतीय सेना ने अपनी श्रेष्ठता को बुलन्द किया है ।

यहां विचारणीय प्रश्न भारतीय व्यवस्था के नीतिकारों के लिए है कि आखिर कब तक भारतीय सैन्य व्यवस्था पुराने ढर्रे पर ही चलती रहेगी । जिसको सुधारने के लिए हमें गम्भीर रूप से चिंतन करना होगा कि किस प्रकार हम भारतीय सेना को दुनिया की आधुनिक सेना बनायें और निजी क्षेत्र की ओर हो रहे भारतीय युवा प्रतिभा पलायन को रोक कर भारतीय सैन्य क्षमता को और अधिक शक्तिशाली करें ताकि वक्त पड़ने पर हम दुनिया की श्रेष्ठतम सेना का दर्जा सिद्ध कर सके ।

अब वक्त आ गया है जब भारतीय व्यवस्था के नीतिकारों को भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के विषय में गम्भीरता से विचार करना होगा तभी भारतीय सैनिकों का भला होगा और भारतीय सैनिकों का भला ही भारतीय सेना का भला होना सुनिश्चित करेगा ।

प्रस्तावना: - 15 जनवरी 1949 यह दिन हमारे भारत देश के लिए एक महान दिवस है क्योंकि आज के दिन भारत देश 68 वांं सैन्य दिवस मनाने जा रहा है। आज ही के दिन भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल फ्रांसिस बूचर से जनरल के. एम. करिअप्पा के हाथ में आ गई थी। इसके बाद से चाहे कोई भी परिस्थिति रही हो, सेना ने देश के गौरवान्वित करने का मौका ही दिया है। जब सेना युद्ध में उलझी नहीं होती हो अकसर ऐसा देखने में आता है कि घरेलू आपदाओं के दौर में सेना का इस्तेमाल कुछ अधिक ही हो जाता है। तो क्या बदल रही है भारतीय सेना की भूमिका? क्या होते हैं इसके नुकसान? यदि लड़ाई की परिस्थिति बनी तो क्या होगा सेना के मनोबल पर असर? मनोबल बनाए रखने के लिए क्या करना होगा?

सेना दिवस: - 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश प्रमुख सर फ्रांसिस बुचर ने भारतीय सेना के कमांडा-इन चीफ का पद लेफ्टिनेट जनरल के एम करियप्पा को सौंपा था। भारतीय सेना की कमान पूरी तरह से मिलने के उपलक्ष्य में ही हम हर वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस मनाते आ रहे हैं। भारत आज यानी 15 जनवरी 2016 को अपना 68 वां सेना दिवस मना रही हैं।

फतह: - भारत का वर्ष 2015 - 16 में 40.07 अरब डॉलर रक्षा बजट है, 1949 में जन, करियप्पा आजद भारत की सेना के पहले कमांडर इन चीफ बने। 13 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिकों के साथ भारतीय सेना दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना हैं। भारतीय फौज ने 1947, 65, 71 और 199 में पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी और सभी में फतह हासिल की। बस 1962 में चीन के खिलाफ हार झेलनी पड़ी। घरेलू विपत्ति के दौर में कभी-कभी ही सेना को बुलाया जाना चाहिए पर कई बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है, जब सेना ही इनसे जूझती नजर आती है।

प्राथमिक काम: - सेना का प्राथमिक काम देश की रक्षा करना है। बाहर के दुश्मन से बचाव के लिए उसकी जरूरत होती है। यदि सीमा पर कोई आक्रमणकारी गतिविधि करे तो उसे रोकने के लिए सेना है। इसी लिहाज से फौज को सुसज्जित किया जाता रहा है। इन्ही परिस्थितियों को देखते हुए ही उसके पास तोप, टेंक हैं, गोला-बारूद है और अन्य बड़ी सामग्री है। लेकिन, उसकी दूसरी भूमिका यह है कि जब लड़ाई नहीं चल रही हो और देश में कोई ऐसी कोई विपत्ति आ जाए जिससे निपटने में आंतरिक सुरक्षा बल सक्षम न हो तो उसकी सहायता ली जाती है।

भूमिका: - यह सही है कि घरेलू विपत्ति के दौर में कभी-कभी ही सेना को बुलाया जाना चाहिए लेकिन देश में कई बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है, जबकि सेना ही ऐसी परिस्थितियों से जूझती नजर आती है। उदाहरण के तौर पर कश्मीर में आंतकी गतिविधियां नियमित सी होती हैं और उनसे निपटने के लिए सेना को हमेशा ही वहां तैनात रहना पड़ता है। इसी तरह प्राकृतिक आपदाएं जैसे कहीं बाढ़ आ गई हो तो या फिर कोई बड़ी दुर्घटना हो गई हो तो अकसर सेना को ही बुला लिया जाता है। यह सही है कि सेना के पास पर्याप्त संसाधन होते हैं और उसके पास प्रशिक्षित जवान भी होते हैं, ऐसे में उन्हें बुलाया जा सकता है। लेकिन, ऐसी विपत्ति में सेना का कार्य सीमित दिनों के लिए होता है। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए हालांकि देश में अन्य राहत दल हैं लेकिन उनका अनुशासन इतना बेहतर नहीं है कि वे परिस्थितियों को संभाल सके। शायद इसलिए सेना को बार-बार इन मामलों में याद किया जाता है। चूंकि सेना लड़ाई में तो व्यस्त नहीं है और इतने बड़े देश में कहीं न कहीं तो ऐसी परिस्थिति बन ही जाती है, जबकि सेना की सहायता लेनी पड़ जाती है। ऐसे में लगता यही है कि जैसे सेना का कार्य घरेलू विपत्तियों से निपटना ही रह गया है। वास्तव में इसे सेना की भूमिका बदलना नहीं बल्कि सिर्फ भ्रम ही कहा जाएगा।

अभ्यास: - जरा सोचिए कि यदि कश्मीर में पाकिस्तान या चीन का हमला हो और जो फौज वहां घरेलू परिस्थितियों से जूझ रही हो उसके लिए दूसरी तरफ मुंह मोड़ कर लड़ना कितना कठिन हो सकता है? इसलिए यह तो सोचना ही पड़ेगा कि यदि सेना को इस तरह के कामों में लगा भी लिया गया तो इसके लिए कुछ समय-सीमा तो तय हो। उदाहरण के तौर पर यदि कोई खिलाड़ी ओलंपिक में भाग लेता है तो उसे साल भर तक उसका अभ्यास करना पड़ता है। सैनिक यदि घरेलू स्तर पर ही व्यस्त हो तो उसे युद्ध के लिए अभ्यास के लिए समय कब मिलेगा? एक बड़ा नुकसान यह है कि सेना लंबे समय तक यदि घरेलू परिस्थितियों से जूझती है तो उसकी विशेष राजनीतिक सोच भी बनने लगती है। आज से 20 साल पहले तक तो फौज के मन में राजनीतिक सोच की बात तो दिमाग में आती ही नहीं थी लेकिन अब सैनिक यह सोचने लगे हैं कि उसे सेना में कार्य करते हुए क्या मिल रहा है? उसे अपेक्षाकृत अन्य सेवा के लोगों से कम सेवाए मिल रही है।? दीर्घकालीन में सेना की ओर से हस्तक्षेप करने की आशंका बनने लगती है। सैनिक के मन में आने लगता है कि उसे ये भत्ते नहीं मिल रहे हैं। सैनिक अब यह सोचने लगा है कि सीमा पर जान हम देते हैं लेकिन सुविधाएं पाने के मामले में अन्य लोग आगे रहते हैं। जबकि अन्य सेवाओं के लोगों को इस तरह के भत्ते मिल रहें हैंं।

भारतीय: - इन वर्षों में सेना के जांबाज सैनिकों और अधिकारियों ने यह पूर्ण रूप से प्रमाणित कर दिया है कि भारतीय सेना विश्व की किसी भी सैन्य -शक्ति से कम नहीं है। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी 1 वर्ष 5 माह तक सेना की कमान ब्रिटिश सेना अधिकारी सर फ्रांसिस बूचर के ही हाथों में रही। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कमान भारतीय हाथों में सौंपने से पहले, यह संशय प्रकट क्रिया कि अभी कुछ वर्षों के लिए सेना की कमान ब्रिटिश जनरल के हाथों में ही रहने दी जाए क्योंकि हमें इसका अनुभव नहीं है। सेना के एक उच्च अधिकरी ने कहा, ’सर हमें अनुभव तो हमें देश का प्रधानमंत्री बन कर देश चलाने का भी नहीं था किन्तु आप सफलतापूर्वक यह कार्य कर रहे हैं, तो फिर आपको जनरल के. एम. करिअप्पा की काबिलियत पर संशय क्यों? ’ प्रधानमंत्री ने तब निर्णय किया और 15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बुचर से जनरल के. एम. करिअप्पा के हाथों में आ गई, तभी से 15 जनवरी सेना दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।

मार्शल: - 26 जनवरी के दिन दिल्ली में अमर जवान ज्योति पर उन सभी सैनिकों को श्रंदाजली दी जाती है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहूति दी थी। सेना दिवस पर सेना के सभी कमांड-बढ़े कार्यालय पर और सेना की सभी यूनिटों में विभिन्न प्रकार के आयोजन किए जाते हैं जनरल करिअप्पा ने स्वस्थ्य परंपराओं, अनुशासन, देश के प्रति समर्पण और राजनीति से सदा दूर रहने के संस्कार दिए। भारतीय सेना में पूर्ण भारतीयता की नींव डाली। वे जीवन पर्यन्त एक सैनिक बने रहे। और सेनाओं की मर्यादा को निभाते रहे। शायद इन्ही विशेषताओं के कारण अवकाश प्राप्त करने के बाद देश ने उन्हें फील्ड मार्शल की पदवी से नवाजा था।

सेना: -सन्‌ 1948 से लेकर आज तक सेना ने एक बार नहीं अनेक बार अपना समर्पण, बहादुरी और बफादारी के परिचय दिए है। चाहे वे प्राकृतिक आपदाएं ही रही हों या सीमा पर शत्रु से लोहे लेने की जरूरत पड़ी हो। इतना ही नहीं जब जब हमारे राजनेताओं और नौकरशाहों उचित नर्णिय लेने में सक्षम नहीं हुए, तब-तब सेना ने अपने स्तर सही निर्णय लेकर कार्य को सम्पादित किया है। एक घटना भारतीय सैन्य अकादमी के देहरादून को संबोधित करते हुए आर्मी कमांडर शमी खां ने स्वयं बयां की थी। कि पाकिस्तानी सेना ने सियाचिन की भारतीय चौकियों पर हमला कर तीन-चार चौकिंया कब्जा ली थी। उन्होंने उधमपुर से सियाचन जाकर अपना कैम्प लगा दिया और स्थानीय कमांडर को बलाकर हिदायत दी कि शमी खां यहां से वापस तब ही जाएगा जब ये चौकियां पाकिस्तान से वापस ले ली जाएगी। स्थानीय कमांडर ने सियाचिन में तैनात सेना से इस उद्देश्य की प्राप्ति में संशय प्रकट किया । शमी ने स्वयं स्थिति का जायजा लिया और आवश्यक ट्रुप्स सियाचिन में मंगवायें और उन चौकियों में वापिस कब्जा किया। उन्होंने लिखा है कि ’मैंने यह सब कुछ इसलिए किया क्योंकि भारतीय सेना के इतिहास में यह न लिखा जाए कि मेरी कमान के दौरान सियाचिन की चौंकयां पाकिस्तान ने हथियां ली।’

आर्मी: - अमृतसर स्वर्ण मंदिर में आर्मी एक्शन के समय दिल्ली में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री वार-रूम में बैठकर एक्शन की पल-पल की रिपोर्ट ले रही थीं। जनरल ने रात के 2.30 बजे के आस पास प्रधानमंत्री को सूचित किया कि आर्टलरी और टेंको की सहायता के बिना अमृतसर की अभेद्य किलेबेदी को तौड़ना मुमिकन हैं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारतीय सेना को हार का मुंह देखना पड़ेगा। प्रधानमंत्री असमंजस में थी। वे आर्टलरी और टेंको को इस्तेमाल नहीं करना चाहती थी। सेना ने अपने निर्णय लिए, आर्टलरी फायर का इस्तेमाल भी किया और टेंक भी अंदर भेजे, सुबह तक भारतीय सेना का स्वर्ण मंदिर पर कब्जा था।

सन्‌ 1971 के युद्ध में जब जनरल मानेक शॉ ने करीब एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण करवाया था। उस समय कुछ राजनीतिक और नौकरशाहों को यह मान्यता थी कि इन्हें समाप्त कर दिया जाए। मानेक शॉ इससे सहमत नहीं हुए और उन्होंने युद्ध बंदियों को देश के हवाले कर दिया।

मनोबल: - सेना से अच्छे परिणाम के लिए उनके मनोबल को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। मनोबल गिरता है तो आधुनिक हथियार, सुविधाएं भी आशांतीत परिणाम प्राप्त करने में मदद नहीं कर पाते। इसलिए हमारे सैनिक अपनी वर्दी उतारते हैं तो उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। हमारे देश में पिछले कई वर्षों से सेना के प्रति बरती जा रही उदासीनता निश्चित रूप से सेना के मनोबल को प्रभावित करेगी। अब हाल ही के मौहोल पर नजर डाली जाए तो पूर्व सैनिक के वन रैंक वन पैंशन व सातवे वेतन आयोग में सेना के प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था जिससे सेना का मनोबल धीरे-धीरे घटता जा रहा हैं। मनावैज्ञानिक भलीभांति समझते हैं कि जब व्यक्ति अपनी पीड़ाओं को व्यक्त करने में असमर्थ पाता है तो उसकी कार्यकुशलता पर क्या असर पड़ता हैं?

हमारी फौज की स्थिति

भारत

पाकिस्तान

चीन

अमरीका

सैनिक

13, 25, 000

6, 17, 000

22, 85, 000

14, 30, 000

टैंक

3, 569

3, 124

9, 150

8, 325

आर्म्ड फाइटिंग व्हीकल्स

5, 085

3, 187

5, 085

25, 782

सेल्फ प्रोपेल्ड गन

290

470

1, 710

1, 934

आर्टिलरी

6, 445

3, 263

6, 246

1, 791

मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर

292

200

1, 770

1, 330

उपंसहार: - देश की रक्षा के लिए सेना कितनी महत्वपूर्ण है यह हमें समझना होगा इसके लिए अन्य सेवाओं की अपेक्षा सेना की हर आवश्यकता का ध्यान सरकार को रखना होगा एवं इसके साथ उनके मनोबल को बनाए रखने के लिए उन्हें हर समय प्रेरित करना होगा जिससे वे प्राथमिक कार्य से भटके नहीं हैं और अपना कार्य मन लगाकर करें।

- Published/Last Modified on: March 25, 2016

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